धर्मेन्द्र झा/रासस
काठमांडू, 21 फागुनः नेपाल की राजनीति जब अनिश्चितता के भंवर में फंसने लगती है और सड़कों पर आक्रोश की लहर चलती है, तब बहुतों को लगता है—अब कहीं व्यवस्था ही न ढह जाए! देश में ऐसे क्षण कई बार आए हैं। हाल का ही उदाहरण लें, अर्थात् भाद्र 23 और 24 की उस ‘जेनजी विद्रोह’ के बाद का समय याद करें! जनमानस के मन में जो सन्नाटा और संशय छा गया था, उसने नेपाल के लोकतांत्रिक भविष्य पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया था। लेकिन आज संपन्न हुए चुनाव ने उन सभी संशयों को चीरते हुए एक मजबूत संदेश दिया है कि नेपाली लोकतंत्र संकट के समय और अधिक संभलता है और यह समाधान खोजने की क्षमता रखता है।
गत भाद्र 27 को पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में सरकार गठन होने पर बहुतों को यह केवल ‘आवश्यकता के सिद्धांत’ का एक कमजोर सहारा मात्र लगा था। विद्रोह की तपिश, भौतिक संरचनाओं की क्षति और कानून-व्यवस्था के अभाव की उस तरल स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव हो जाएगा—यह कहना मात्र कल्पना जैसा लगता था। अत्यधिक अविश्वास था, गहरी निराशा थी। पूरे देश में सन्नाटा पसरा हुआ था, मानो किसी बड़े तूफान के बाद का सन्नाटा हो। उसके भीतर एक प्रकार की शून्यता थी।
दरअसल देश में जेनजी पीढ़ी का ऐसा अप्रत्याशित विद्रोह हुआ था कि वह कोई सामान्य आकस्मिक घटना नहीं थी। सिंहदरबार से लेकर देश की महत्वपूर्ण भौतिक संरचनाओं तक क्षति पहुँची। दो दिनों के आंदोलन से लोगों की आशाओं और आस्थाओं के स्तंभ अचानक ढहने लगे। अनुशासन भंग हो गया और कानूनहीनता की स्थिति पैदा हो गई। भाद्र के अंतिम सप्ताह की देश की परिस्थिति को याद कीजिए! स्थिति इतनी तरल हो गई थी कि अगले दिन क्या होगा, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल था। तरह-तरह के आकलन किए जा रहे थे और कहा जा रहा था कि नेपाली लोकतंत्र का भविष्य अंधेरी सुरंग में प्रवेश कर रहा है। ऐसे समय में चुनाव संभव होगा—यह कल्पना भी बहुत दूर की बात लग रही थी। शुरुआती दिनों में न राजनीतिक दलों को और न ही आम जनता को विश्वास था कि वे आज का यह दिन देख पाएंगे। यहाँ तक कि जब पूरा देश चुनाव की तैयारी में लग चुका था, तब भी कुछ दिन पहले तक अनेक तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थीं।
कहा जाता है कि आकाश को ढकने वाले काले बादलों के भीतर भी चांदी की एक परत होती है। हाँ, उसी चांदी की परत के भीतर भविष्य को देखा—सम्माननीय सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार ने। सम्माननीय राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल द्वारा संवैधानिक उपाय के रूप में खींची गई चुनाव सम्पन्न करने की ‘लक्ष्मण रेखा’ के भीतर रहते हुए प्रधानमंत्री कार्की ने चुनाव को अपना अर्जुन दृष्टि बना लिया। इसलिए आज वह चुनाव संभव हो सका, जो असंभव सा लग रहा था।
जब राजनीतिक दल ही चुनाव की निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर संशय में थे, तब सरकार ने चुनाव को लोकतंत्र बचाने और संविधान को पुनः पटरी पर लाने का एकमात्र संकल्प बनाया। एक ओर सिंहदरबार में मानो आग सुलग रही थी, दूसरी ओर सरकार को लेकर राजनीतिक दलों सहित अन्य पक्ष भी आश्वस्त नहीं थे। वे चुनाव की निष्पक्षता और सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए तरह-तरह की अटकलें लगा रहे थे, लेकिन सरकार अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुई। धीरे-धीरे अविश्वास को विश्वास में बदलने का प्रयास जारी रखा।
कार्की नेतृत्व वाली सरकार ने कमजोर मनोबल में बताई जा रही सुरक्षा एजेंसियों, चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को विश्वास में लेते हुए आगे बढ़ना जारी रखा। पटरी से लगभग उतर चुके संविधान को फिर से स्थापित करने, कानून के शासन को बनाए रखने और विद्रोह के माध्यम से जेनजी पीढ़ी द्वारा माँगे गए सुशासन को स्थापित करने के लिए चुनाव के अलावा कोई विकल्प नहीं था। प्रतिनिधि सभा के विघटन या कार्यकाल समाप्त होने के छह महीने के भीतर चुनाव कराना संवैधानिक व्यवस्था थी। शायद इसी मर्म को समझने के कारण पूर्व प्रधान न्यायाधीश कार्की के नेतृत्व वाली सरकार उस दायित्व से विचलित नहीं हुई और इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरा किया। इसके लिए सरकार नेपाली जनता की ओर से धन्यवाद की पात्र है।
प्रधानमंत्री कार्की की अडिग निष्ठा और साहस में उनके सहयोगी गृह मंत्री ओमप्रकाश अर्याल की शालीनता और धैर्य का भी बड़ा योगदान है, जिसके कारण आज यह चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो सका।
फिर दोहराता हूँ—मतगणना शुरू होते समय यह स्वाभाविक है कि बक्सों के भीतर किसका भविष्य कैसा है, यह जानने की उत्सुकता हो। लेकिन इस क्षण में किसी व्यक्ति या दल की जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवस्था की जीत है। यह जीत प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और हम सभी नेपाली जनता की जीत है। प्रधानमंत्री कार्की, जिनके अदम्य साहस की यह जीत है। उन्होंने जेनजी समूह की धमकियों और दबाव के बीच भी अपनी न्यायिक निष्ठा और कार्यकारी दृढ़ता को डगमगाने नहीं दिया। इसमें गृह मंत्री अर्याल की शालीनता और चुनाव आयोग की दिन-रात की मेहनत भी उतनी ही प्रशंसनीय है।
जेनजी विद्रोह ने एक स्पष्ट संकेत दिया था कि अब की पीढ़ी पुराने ढर्रे की ‘कंजर्वेटिव’ राजनीति से संतुष्ट नहीं है। इसलिए यह चुनाव अब नेपाल को ‘लिबरल डेमोक्रेसी’ और वास्तविक सुशासन की ओर ले जाने वाला नया द्वार खोलता है।
कहा जाता है—रास्ता भटकने से केवल दिन बदलता है, लेकिन अवसर चूकने से युग बदल जाता है। आज हम गर्व और विश्वास के साथ कह सकते हैं कि अब हमें फिर से कठिन दिनों का सामना नहीं करना पड़ेगा। क्योंकि हमने संकट के बीच भी अवसर नहीं गंवाया। हमने मौका भी नहीं खोया।
अब हमें सरकार गठन के लिए किसी ‘आवश्यकता के सिद्धांत’ का सहारा नहीं लेना पड़ेगा और न ही लोकतंत्र के संवर्धन तथा गणतंत्र की रक्षा के लिए किसी बाधा को हटाने की मजबूरी होगी। हमने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए विश्व में सर्वस्वीकृत विधि—चुनाव—को अत्यंत शांतिपूर्ण और निष्पक्ष रूप से सम्पन्न किया है और इसी विधि से आगे बढ़ने का संकल्प लिया है।
इसलिए आज का दिन लोकतंत्र की जीत का दिन है और कल के संकट तथा कठिन परिस्थितियों से निकलकर अब सहज और लोकतांत्रिक मार्ग अपनाने का संकल्प लेने का दिन है। अब मतपेटियों में बंद मतपत्र केवल उम्मीदवारों का भविष्य नहीं हैं, बल्कि वे नेपाल के सुदृढ़ लोकतंत्र की नई आधारशिला हैं।
इस चुनाव के सम्पन्न होते ही देश राष्ट्रीय एकता के मार्ग पर लौट आया है और लोकतांत्रिक संस्कृति की जीत हुई है। प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी देश को इस मुकाम तक पहुँचाने वाली वर्तमान सरकार, दृढ़ संकल्पित नेतृत्व और इसमें सहयोग करने वाले सभी राजनीतिक दल वास्तव में धन्यवाद के पात्र हैं।


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