INT NEWS NETWORK
धर्मेन्द्र झा काठमांडू: फागुन 21 को संपन्न प्रतिनिधि सभा चुनाव के परिणाम क्रमशः सार्वजनिक हो रहे हैं। अब तक हुई मतगणना के अनुसार प्रत्यक्ष निर्वाचन क्षेत्र के लगभग सभी नतीजे सामने आ चुके हैं। चुनाव परिणाम के अनुसार राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) बहुमत के साथ संसद की सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर बढ़ रही है। समानुपातिक मतों की गिनती भी जारी है और मौजूदा स्थिति बरकरार रहने पर पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिलने की संभावना जताई जा रही है।
इस परिणाम को नेपाली जनता द्वारा देश का राजनीतिक नेतृत्व युवाओं के हाथों सौंपने के रूप में देखा जा रहा है। यदि रास्वपा संसद में अकेले दो-तिहाई बहुमत हासिल करती है तो एक ओर राजनीतिक स्थिरता की संभावना बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर सरकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को पूरी तरह लागू करने की स्थिति में होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस चुनाव परिणाम से नेपाल में एक नए युग की शुरुआत का संकेत मिल रहा है। मतदाताओं ने वर्ग, क्षेत्र, जाति, भूगोल और धर्म के आधार पर बनी दूरियों को कम करते हुए समाज को नए तरीके से पुनर्गठित करने का संदेश दिया है। पहले कई निर्वाचन क्षेत्र किसी खास दल के गढ़ माने जाते थे, लेकिन इस बार कई परंपरागत गढ़ टूटते दिखाई दिए हैं।
उदाहरण के तौर पर भक्तपुर-1 और डडेल्धुरा जैसे क्षेत्रों में दशकों से एक ही दल का प्रभाव रहा था, लेकिन इस बार परिणाम अलग आए हैं। वहीं झापा-5 सीट, जो पहले नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी–लेनिनवादी) का गढ़ मानी जाती थी, वहां से रास्वपा के नेता बालेन्द्र शाह ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की है। उन्हें 68 हजार से अधिक वोट मिले और करीब 50 हजार के बड़े अंतर से विजय हासिल की। इस जीत के बाद उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि बालेन्द्र शाह का प्रधानमंत्री बनना आधुनिक नेपाल के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना होगी, जो देश को जोड़ने के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
चुनाव परिणाम से यह भी संकेत मिला है कि कई क्षेत्रों में जातीय आधार पर मतदान की पुरानी प्रवृत्ति कमजोर हुई है। मतदाताओं ने जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर मतदान किया है, जिससे नेपाली समाज में सामाजिक एकता और साझा राष्ट्रीय सोच मजबूत होने का संकेत मिलता है।
इस बार संसद में निर्वाचित महिलाओं की संख्या भी पहले की तुलना में अधिक होने की संभावना है। महिलाओं के साथ-साथ समावेशी समूहों के कई उम्मीदवार भी प्रत्यक्ष मतदान से जीतकर संसद पहुंचने में सफल हुए हैं। साथ ही चुनाव परिणाम से हिमाल, पहाड़ और मधेश के बीच की दूरी कम होने का संकेत भी मिला है, क्योंकि विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के मतदाताओं ने समान रूप से परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया है।
विश्लेषकों का कहना है कि नेपाली मतदाता अब पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव से बाहर निकलकर नए विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं। लंबे समय से चल रही अस्थिर राजनीति, पुराने दलों का वर्चस्व और बार-बार बदलती सरकारों से जनता में असंतोष था। इस चुनाव में मतदाताओं ने उसी असंतोष को मतदान के जरिए स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है।
राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल के अनुसार इस बार मतदान प्रतिशत करीब 59 प्रतिशत ही रहा, जो अपेक्षा से कम है। इससे यह संकेत मिलता है कि सभी मतदाता नई राजनीतिक शक्तियों की ओर पूरी तरह आकर्षित नहीं हुए हैं। हालांकि पड़े हुए मतों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट है कि पुराने दलों के प्रति मतदाताओं में गहरी निराशा दिखाई दे रही है।
8 और 9 सितम्बर को हुए जनआन्दोलन (जेन–जी आन्दोलन) ने भी नेपाली समाज में बदलाव की चाह को उजागर किया था। मौजूदा चुनाव परिणाम को उसी आंदोलन की भावना को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से मिली स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। कई विश्लेषक इसे “रिवोल्यूशन बाय बैलेट” यानी मतपत्र के माध्यम से हुई क्रांति भी बता रहे हैं।
वर्तमान स्थिति के अनुसार रास्वपा दो-तिहाई बहुमत की ओर अग्रसर दिख रही है। इसे नेपाल की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। मतदाताओं ने नई सरकार को पांच वर्षों तक स्थिर शासन देकर विकास, सुशासन और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की दिशा में ठोस काम करने की जिम्मेदारी सौंपी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नई सरकार स्थिरता के साथ काम करती है तो नीतिगत स्थिरता, विकास परियोजनाओं की निरंतरता और सुशासन स्थापित करने की संभावना मजबूत होगी। यह चुनाव केवल सरकार बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नेपाल की राजनीति को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर भी माना जा रहा है।
साभार:: नया पत्रिका


0 Comments